श्री वीतरागाय नमः
मंगलं भगवान वीरो , मंगलं गौतमो गणी मंगलं कुन्दकुंदार्यो , जैन धर्मोsस्तु मंगलं
सर्वव्याप्येकचिद्रूपस्वरूपाय परात्मने
स्वोपलब्धिप्रसिद्धाय ज्ञानानंदात्मने नमः १ सर्वव्यापी होने पर भी मात्र एक चैतन्यरूप है स्वरुप जिसका और जो स्वानुभव से प्रसिद्ध होनेवाला है उस ज्ञानानंद स्वभावी उत्कृष्ट आत्मा को नमस्कार हो
स्वोपलब्धिप्रसिद्धाय ज्ञानानंदात्मने नमः १ सर्वव्यापी होने पर भी मात्र एक चैतन्यरूप है स्वरुप जिसका और जो स्वानुभव से प्रसिद्ध होनेवाला है उस ज्ञानानंद स्वभावी उत्कृष्ट आत्मा को नमस्कार हो
सर्वव्यापी (अर्थात सर्व को देखनेवाला जाननेवाला) एक चैतन्यरूप (मात्र चैतन्य) जिसका स्वरुप है और जो स्वानुभव प्रसिद्ध है (अर्थात शुद्ध आत्मा के अनुभव से प्रकृष्टपने सिद्ध है) उस ज्ञानानंदात्मक (ज्ञान और आनंद स्वरुप) उत्कृष्ट आत्मा को नमस्कार हो
तीर्थंकर का नाद है, आत्म ज्ञान स्वरुप |
जो ज्ञायक को देखता, परिणति आनंदरूप ||
जिस पद को समझे बिना , पाया दुःख अनंत |
समझाया उस पद नमू , श्री सद्गुरु भगवंत ||
...जय जिनेन्द्र ...

