बुधवार, 2 जून 2010

धर्म

धर्म क्या है ?

धारण करने का नाम धर्म है|
अनेकांत वस्तु (पदार्थ) का धर्म है| [अर्थ]
अनेकान्तवाद (स्यादवाद) वाणी का धर्म है| [सूत्र]
जानना आत्मा का धर्म है| [पद]
सुत्रार्थ पद निश्चय सम्यक्दर्शन का धर्म है|
आनंदित रहकर जानना अनुभूति का धर्म है|
"मेरा प्रयोजन क्या है ?" इस विकल्प का शमन विधि पूर्वक करना यह आत्मार्थी का धर्म है|
जीव मात्र का प्रयोजन सुखी होना है|
सभी धर्म का प्रयोजन सुख का मार्ग बताना है|
जगत के भिन्न भिन्न मत मात्र द्रष्टि भेद है, आत्मा अभेद है|
द्रष्टि में अभेद, स्रष्टि से भेद, ज्ञानमे भेदाभेद ऐसा आत्मा अभेद है|
आगम, युक्ति, पर-अपर गुरु का अवलंबन और स्वसंवेदन (अनुभव) से उक्त कथनों  को प्रमाणिक करना जिससे सुख की प्राप्ति हो, वस्तुतः यही सुख  वास्तविक धर्म है |