बुधवार, 2 जून 2010

धर्म

धर्म क्या है ?

धारण करने का नाम धर्म है|
अनेकांत वस्तु (पदार्थ) का धर्म है| [अर्थ]
अनेकान्तवाद (स्यादवाद) वाणी का धर्म है| [सूत्र]
जानना आत्मा का धर्म है| [पद]
सुत्रार्थ पद निश्चय सम्यक्दर्शन का धर्म है|
आनंदित रहकर जानना अनुभूति का धर्म है|
"मेरा प्रयोजन क्या है ?" इस विकल्प का शमन विधि पूर्वक करना यह आत्मार्थी का धर्म है|
जीव मात्र का प्रयोजन सुखी होना है|
सभी धर्म का प्रयोजन सुख का मार्ग बताना है|
जगत के भिन्न भिन्न मत मात्र द्रष्टि भेद है, आत्मा अभेद है|
द्रष्टि में अभेद, स्रष्टि से भेद, ज्ञानमे भेदाभेद ऐसा आत्मा अभेद है|
आगम, युक्ति, पर-अपर गुरु का अवलंबन और स्वसंवेदन (अनुभव) से उक्त कथनों  को प्रमाणिक करना जिससे सुख की प्राप्ति हो, वस्तुतः यही सुख  वास्तविक धर्म है | 

मंगलवार, 23 मार्च 2010

मंगलाचरण

श्री वीतरागाय नमः
मंगलं भगवान वीरो , मंगलं गौतमो गणी
मंगलं कुन्दकुंदार्यो , जैन धर्मोsस्तु मंगलं


सर्वव्याप्येकचिद्रूपस्वरूपाय परात्मने
स्वोपलब्धिप्रसिद्धाय ज्ञानानंदात्मने नमः १
सर्वव्यापी होने पर भी मात्र एक चैतन्यरूप है स्वरुप जिसका और जो स्वानुभव से प्रसिद्ध होनेवाला है उस ज्ञानानंद स्वभावी उत्कृष्ट आत्मा को नमस्कार हो
सर्वव्यापी (अर्थात सर्व को देखनेवाला जाननेवाला) एक चैतन्यरूप (मात्र चैतन्य) जिसका स्वरुप है और जो स्वानुभव प्रसिद्ध है (अर्थात शुद्ध आत्मा के अनुभव से प्रकृष्टपने सिद्ध है) उस ज्ञानानंदात्मक (ज्ञान और आनंद स्वरुप) उत्कृष्ट आत्मा को नमस्कार हो
तीर्थंकर का नाद है, आत्म ज्ञान स्वरुप |
जो ज्ञायक को देखता, परिणति आनंदरूप ||
जिस पद को समझे बिना , पाया दुःख अनंत |
समझाया उस पद नमू , श्री सद्गुरु भगवंत ||

          ...जय जिनेन्द्र ...